शुक्रवार, जनवरी 8

जाने दो


क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो,
क्यों किस्मत से लड़ते हो?
जाने दो...

फिर हिंदुस्तान को तरसोगे ,
फिर यादों के जंगल में भटकोगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

क्यों वक़्त अपना ज़ाया करते हो,
क्यों वही पुरानी ख़्वाहिश करते हो
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

बारिश में फिर अपनी मट्टी की खुशबू ढूँढोगे,
बूँदों की आड़ में खुद भी धीरे-धीरे बरसोगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

फिर खलेगा गैर-ज़बान में बतियाना,
जज़्बातों का अंग्रेजी से आँख चुराना,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

फिर माँ की रसोई बुलाएगी,
फिर पिज़्ज़ा की शकल रुलाएगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

हथेली में भाई की उँगलियाँ याद आएँगी,
खाली-पीली फिर आँखें भर आएँगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

वो दिल्ली जो बस्ती है यादों में, अब नहीं है,
वो जादू, वो दौर, वो लम्हें, अब नहीं हैं,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

हाँ, यादों की धूल आज भी सड़कों पे पड़ी होगी,
हर मोड़ पे माज़ी की कोई तस्वीर जड़ी होगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

इंडिया गेट, नई दिल्ली फोटो क्रेडिट- अंजना दयाल दे प्रेविट 

फिर दिल्ली की सड़कों को ललचाओगे,
यहाँ तक के सफर को फिर पछताओगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

बचपन ने जिसे रंगा था, वो तितली अब कहाँ मिलेगी?
भीगी थी जिसमे जवानी, वो बदली अब कहाँ मिलेगी?
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

इस दर्द  को यूँ ही ख़ामोश लहू में बहने दो,
याद-ए-सरज़मीं  को यूँ ही चुपचाप सिसकने दो.
जाने दो,
क्यों अपनी ही हस्ती से लड़ते हो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?
जाने दो....
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!