मंगलवार, दिसंबर 20

हिंदी उर्दू के पंख


माना बंद हैं दरवाज़े समय के,
लफ़्ज़ों के झरोखों से उड़ उड़ जाऊं मैं,
रोक सके तो दिखा रोक के, ऐ परदेस मुझे,
हिंदी उर्दू के पंख लगा के उड़ उड़ जाऊं मैं,

बातचीत के बीच उड़ जाऊं,
मन ही मन मुस्का उड़ जाऊं,
सबको चकमा देके उड़ उड़ जाऊं मैं 

तबले की ताल पे उड़ जाऊं,
सितार को ढाल बना के उड़ जाऊं,
बांसूरी की धुन पे, उड़ उड़ जाऊं मैं

गोल-गप्पों की याद में उड़ जाऊं,
इमली का खट्ठा स्वाद लिए उड़ जाऊं,
साथ तड़के के धुएँ के,  उड़ उड़ जाऊं मैं

शेरों से बुने कालीन पे उड़ जाऊं,
यूँ परदेसी ज़मीन से उड़ जाऊं,
ख्यालों की बाँह पकड़े, उड़ उड़ जाऊं मैं

मेहँदी से नक्शा बना के उड़ जाऊं,
चूड़ियों के सितारों में उड़ जाऊं,
भाई की सूरत देख चाँद में, उड़ उड़ जाऊं मैं

सपनों की सिड़ी बना के उड़ जाऊं,
ख्वाहीशों के पीछे-पीछे उड़ जाऊं,
दुआ का आँचल थामे, उड़ उड़ जाऊं मैं

शनिवार, दिसंबर 10

मैं भी हिंदुस्तान हूँ

अगर हर हिन्दुस्तानी को कम-से-कम एक साल के लिए हिंदुस्तान से दूर रहने का मौका मिले, ख़ासकर उन्हें जो अक्सर अपने देश की आलोचना किया करते हैं तो शायद उन्हें अपने देश और इस देश में जन्म लेने की सही कीमत पता लग सके. हाँ, गरीबी है, भ्रष्टाचार भी है, पर यह सब कहाँ नही है? 

नहीं है तो देश की मिटटी की खुशबू नहीं है, बस स्टैंड के पास चाय की दूकान पे रेडियो पे बजते हिंदी फिल्मों के गाने नहीं हैं, घर में किसी भी समय आने वाले मेहमान नहीं हैं, वो पड़ोसी नहीं हैं जिनसे ज़रुरत पड़ने पर चाय की पत्ती मांगी जा सके और बड़ों के वो अनगिनत हाथ नहीं हैं जो सर छू कर दुआ देते नहीं थकते…

जब चाह कर भी लौट न पाएँ तो नाले के पानी की बदबू की याद भी अच्छी लगने लगती है. शायद इसलिए क्यूंकी वहां से गुज़रते हुए सहेली हमेशा साथ होती थी और साथ होती थी हंसी और मस्ती! हर याद दिल के और करीब आ जाती है. जो रिश्ते टूट गए, उनके टूटने की आवाज़ और ज़ोर से गूंजने लगती है, और जो रिश्ते जिंदा हैं उन्हें बरक़रार रखने की लौ ज़रा और तेज़ हो जाती है.

कभी रोटी, कभी पैसा, कभी ख्याति, कभी कोई और मजबूरी, अपनी मिटटी से दूर ले जाती है, मगर कोई भी चमक-धमक वापिस लौटने की इच्छा पे ग़ालिब नहीं हो पाती. सारी बुराइयाँ फीकी पड़ने लगती हैं. हाँ, यह ज़रूर याद रहता है की मेरे देश में हज़ारों तरीके पकवान बनते हैं, किसी भी मज़हब से जुड़ा त्यौहार क्यूँ न हो, हवा में खुशियाँ झूमने लगती हैं. कितनी सारी धुनें, अलग-अलग किस्म का संगीत, नाच, खाना, कपडे… कपड़ों में कितने प्रकार की छपाई, कढ़ाई, कितनी सारी भाषाएँ, उसे पुकारने को कितने नाम! भारतीय संस्कृति, इतिहास, आध्यात्मिकता इस दुनिया के खूबसूरत और अनूठे जेवर हैं!

उफ़, कुछ नहीं यहाँ, और अगर है भी तो सिर्फ एक महंगी झलक! हाँ, कुछ और भी है यहाँ, रोज़ उठते सवाल! कौन हूँ मैं? क्या एक दिन बिंदी लगा के मुक्कमल हिन्दुस्तानी बना जा सकता है? मगर फिर याद आता है की मेरी हिन्दुस्तानी रूह, मेरे हिंदुस्तान से दूर रहने के फैसले से ज्यादा ताकतवर है. 

रसोईघर से हर रोज़ उठती मसाले की गंध, लैपटॉप में बजती ग़ज़लें, गोरी सहेलियों के हाथों में मेरी मेहँदी, हिंदी में बेटे को डांट, दिल्ली की यादों में भीगे ये आंसूं, मेरी कवितायें, वो देसी घी के दीप जो जीवन को राह दिखाते हैं, मेरे हिंदुस्तान को हिंदुस्तान के बाहर भी जिंदा रखते हैं. उस हिंदुस्तान को, जिस पर मुझे और मेरे जैसे करोड़ों हिन्दुस्तानियों को सिर्फ गर्व है और एक बेहतर कल के लिए कोई शक नहीं है.  



याद-ए-सरज़मीं में भीगा रहता है

दिल के किसी कोने में एक दर्द छिपा रहता है

रविवार, दिसंबर 4

ढक्कन :-)


यह रचना उन मुट्ठीभर प्रियजनों के लिए है जो अभी भी धर्म या जाती के नाम पर अपने आपको दूसरों से ऊँचा समझने की भूल करते हैं… मगर हम यह भी जानते हैं की रूठ कर तो कोई भी खुश नहीं रहता… बस इन ढक्कनों का ढक्कन खोलने की ज़रुरत है :-) 

वो एक ही है, कब से जानते हैं,
फिर भी झूटों उसे बांटते हैं,
ये सब जानते हैं 

दिल दुखता है उसका, 
जब लड़ते हैं नाम लेके उसका
हम सब ये जानते हैं 

बेवकूफ़ी है, जहालत है,
वजह-ऐ-फर्क-ऐ-ईमान से जो बिगड़ी हालत है 
आप भी जानते हैं 

किसी दिन खुदा की जो सुन लेते,
दीन-ईमान में भाईचारा वो बुन लेते
हम ये मानते हैं 

इनाम मुहब्बत-ओ-क़ुरबानी का बड़ा होता है,
सजा से मुआफी देने वाला बड़ा होता है,
बच्चे भी जानते हैं 

थकते नहीं हैं, ऊँगली उठा उठाके?
खुद भी गिरते हैं, उन्हें गिरा गिराके,
क्यूँ नहीं मानते हैं?

दिल को भाते हैं बच्चे मिलके खेलते हुए,
सुलह की कसक उठती है उन्हें देखते हुए,
हम यह जानते हैं :-)

नाराज़गी का ढक्कन प्यार का बहाव रोक देता है
इंसान को उसका ही 'मैं' रोक देता है,
आखिर इस 'मैं' की क्यूँ मानते हैं?

आओ अपने सच और फ़र्ज़ पे ध्यान लगाएं,
रोज़-ब-रोज़ कुछ और उसके करीब आ जाएं,
यही चाहता है वो, जानते हैं? 

    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!