रविवार, दिसंबर 10

तेरा करम


ऐ खुदा, टूट-टूट कर भी खड़ा हूँ मैं,
यह तेरा करम नहीं तो और क्या है?
 
इतने वार, इतने ज़ख्म, और मुस्कुरा हूँ मैं,
यह तेरा करम नहीं तो और क्या है?
 
थक के चूर हूँ, फिर भी चल रहा हूँ मैं,
यह तेरा करम नहीं तो और क्या है?
 
बेहाल हूँ  मगर आज भी दूसरों की दवा हूँ मैं,
यह तेरा करम नहीं तो और क्या है?
 
दबा रहें है मेरी आवाज़ लेकिन आज़ाद सदा हूँ मैं,
यह तेरा करम नहीं तो और क्या है?

गुरुवार, नवंबर 23

ये मेरा खुदा

ये मेरा खुदा,
सड़कों पे मिल जाता है,
तो कभी बादलों के पीछे से कहीं,
देखके मुस्कुराता है!
 
हर किसी से मुहोब्बत करने को 
दिल में तूफ़ान मचाता है,
ग़रीब, मजबूर, मज़लूमों,
के चेहरों में नज़र आता है!
 
इसे कहीं दिल से पुकार लो,
वहीँ मिल जाता है,
कितने भी लोग खड़े हों आगे,
सीधा मेरे पास आता है!
 
न लाइन का लफड़ा,
न चंदे का चक्कर चलता है,
मैं ही सबसे ख़ास हूँ उसकी,
ऐसे फील कराता है!
 
कुछ भी खाया-पिया हो,
मस्त गले लगाता है,
सारी गलतियाँ माफ़ करके,
फिर से नया बनाता है!
 
ये मेरा खुदा,
अपना वजूद खुद ही संभालता है.
इंसान लड़ मरें इसके लिए,
यह तो बिलकुल नहीं चाहता है! 
 
ये मेरा खुदा,
सबको पास बुलाता है,
ये मेरा खुदा है तेरा खुदा भी,
ये समझाना चाहता है। 

शनिवार, नवंबर 11

सारा आसमाँ हूँ!

आजकल हर तरफ नफरत का बोलबाला है।  कहीं देख लें, हिंसा का कोई न कोई चेहरा नज़र आ ही जाएगा।  हैवानियत अलग-अलग लिबास में नाच रही है।  कहीं मज़हब, कहीं रंग भेद, कहीं पैसा तो कहीं सियासत! और लोग गुटों में बँट गए हैं।  दुसरे का दर्द महसूस कम होने लगा है, अपनों की ग़लतियाँ कम नज़र आने लगीं हैं।  और हाँ, अपने लोगों की परिभाषा भी जैसे बदल रही है।  पहले दोस्त, पड़ोसी, साथ में  काम  करने वाले, रिश्तेदार कोई भी अपनों की गिनती में आता था।  आज कल अक्सर मज़हब और राजनितिक राय न मिले तो आप अपने नहीं रहते। और ये हाल सिर्फ इंडिया में ही नहीं बल्कि और देशों में भी दिख रहा है... पूरा विश्व जैसे अलग-अलग गुटों में बंटता जा रहा है... लोग मिलते हैं तो फेसबुक पर, वास्तव में मिलते हैं तो आँखें नहीं मिला पाते और जो आँखें मिल जाएं तो दिल नहीं मिलते। मगर सब ऐसे नहीं हैं। जिनकी आँख उससे लड़ चुकी है, वो फ़र्क़ नहीं कर पाते :-) वो तो उनके कान में अपनी बात फूँक के, अपना जादू चला चुका!  


मैं बौद्ध, सिख, इसाई 
हिन्दू और मुसलमाँ हूँ,
दिल में बस जाता हूँ,
वैसे सारा आसमाँ हूँ! 

है मोहब्बत मेरी जागीर,
फ़िक़्रों में पनाह हूँ,
मुस्कुराहटें हो जहाँ, 
यारा, मैं वहां हूँ!

सियासत-ओ-ताकतों
में मैं कहाँ हूँ?
मत ढूँढ मुझे महलों में,
मैं तो ग़रीब का मकाँ हूँ!

मिल जाऊं तो भुला दूँ सरहदें,
मैं तो पूरा जहाँ हूँ,
जहाँ हर कोई अपना सा लगे,
मैं वो नजरिया हूँ! 

मंदिर में हूँ या मज़्जिद में,
पूछता है के मैं कहाँ हूँ,
बस मोहब्बत भरे दिलों में रहता हूँ,
मैं तो सबका खुदा हूँ! 



शनिवार, नवंबर 4

इंतज़ार-ऐ-असर-ऐ-दुआ में हूँ

मायूसी और फिर लड़ने की जुस्तजू,
दर्द और उम्मीद के बीच सफर में हूँ,
दायरा सिमटा है बस, बंदी नहीं हूँ।  

थक जाता हूँ तो रो लेता हूँ,
उसकी मोहब्बत याद कर मुस्कुराता हूँ,
दरारें पड़ीं हैं, अभी टूटा नहीं हूँ।  

सवाल, सलाह, नसीहत, और इल्ज़ाम,
सुन रहा हूँ हर बात, हर कलाम,
ख़ामोश हूँ, पर लाजवाब नहीं हूँ।  

डर के अँधेरे में है चराग़-ऐ -ईमान,
सर झुका है, हाथ देखते हैं आसमान,
बस इंतज़ार-ऐ-असर-ऐ-दुआ में हूँ।  

शनिवार, सितंबर 9

मेरी कलम

 

पहले लिखा करती थी,
आजकल नहीं लिखती,
पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी, यह कलम,
आजकल नहीं लिखती। 

बहोत बोझ है कन्धों पे इन दिनों,,
इतने मसले, इतने मुद्दे,
समझ ही नहीं पा रही है,
किसे बाद में और किसे पहले लिखे?

बच्चों की बेहाली लिखे या बुज़ुर्गों की,
फिर सोचा बच्चों की आवाज़ बने,
फिर उलझ गयी बेचारी,
दरिया में मरते, अस्पताल में या स्कूल में  मरते बच्चों की आवाज़ बने?


सदमे में है कुछ वक़्त से,
बड़ी-बड़ी कलमों को बिकते हुए देख कर,
और वो जो बिकी नहीं,
उनमें से कुछ को टुकड़े-टुकड़े देख कर!,


दुःखी है उन बड़ी कलमों को देख कर,
जो अंदर से खोकली हो गयी हैं,
जिनके ज़मीर बीमार हो गए हैं,
कई को कतई दोगली हो गयी हैं। 

आज कुछ कदम चली है, पर फिर बैठ गयी है,
अपनी लाचारी पे शर्मिंदा है,
जहाँ तेज़तर्रार कलमें बेबस हैं,
लफ़्ज़ों का पेशा आजकल ज़रा गन्दा है!

पहले लिखा करती थी,
आजकल नहीं लिखती,
पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी,
यह कलम आजकल नहीं लिखती। 
 

रविवार, जुलाई 2

 
 
उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब,
इसमें कोई शक़ नहीं,
मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का,
किसी को हक़ नहीं!
 
 

मंगलवार, अप्रैल 18

दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू


मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है,
तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है,
मेरी कायनात का मरकज़ है तू

आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी,
तू माशूका नहीं, कोई नशा नहीं,
ये तिश्नगी क्या, ये तलब क्यों?

मेरे लफ़्ज़ों में तेरी रूह,
मेरे ख्यालों में तेरी ख़ुशबू ,
तेरे असर के बिना मैं क्या हूँ?

तेरी धुप की मिठास और थी,
उन सर्द रातों की बात और थी,
यहाँ हवाओँ में कहाँ वो जुस्तजू!

खुला आसमाँ है मेरा क़ैदख़ाना,
मेरी आरज़ू सरज़मीं से जुड़ जाना,
मैं बेबस आज़ादी की क़ैद में हूँ,

यह ज़मीं ज़रखेज़ सही,
मगर है तो गैर मिटटी ही,
मैं इसमें अपनी हस्ती कैसे ढूँढू?



एक ख़्वाहिश भिनभिनाती रहती है,
चल वापस चल, दोहराती रहती है,
दिल्ली, यूँ सर चढ़ा है तेरा जादू 

शनिवार, अप्रैल 15

दूर चले गए


मेरा नाम जपते-जपते,
वो मुझसे दूर चले गए,
मुझे अपनी पसंद में ढालते -ढालते 
मेरे वजूद से दूर चले गए...

मुझे बेचते-बेचते,
वो कहाँ से कहाँ चले गए,
मैं यहाँ इंतज़ार में हूँ उनके,
जो घर से मेरे दूर चले गए...

मेरी मुहोब्बत बांधते-बांधते,
मज़हबी नामों-ओ-इमारतों में,
वो आज़ादी-ए -मुआफ़ी से
बहोत होते दूर चले गए...

मैं आवाज़ देते-देते,
थक गया हूँ उन्हें,
मेरे नाम से जो बुलाते हैं दूसरों को,
वो ख़ुद क्यों मुझसे दूर चले गए?

शायद मुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते,
मेरी पहचान ही भूल गए,
मैं तो सबका हूँ, सब मेरे,
वो मेरी सच्चाई से दूर चले गए....!


शुक्रवार, जनवरी 13

सीरिया!

 
 इंसानियत की यह हालत नहीं सही जाती,
अलेप्पो से आती चीखें नहीं सुनी जाती,
बच्चों की बिलखती तस्वीरें देखी नहीं जाती,
मुझ से होश की ज़िन्दगी जी नहीं जाती, 
 
मज़हबी दायरों में दीन मिलता नहीं ,
सियासतदानों से रहम मिलता नहीं ,
दर-दर ढूँढ़ते हैं, हरम मिलता नहीं ,
इन बेबसों को अक्सर करम मिलता नहीं
 
लिखा कई बार पहले भी इस बारे,
सब के सब लफ्ज़ हैं हारे,
बड़ी हैं लहरें, दूर हैं किनारे,
लाडली, आज तेरे सारे  हमदर्द हैं बेचारे!
 
 इंसानियत का दिल कब तक देह्लेगा?
ये जहाँ फेसबुक से कब तक बहलेगा?
यह ज़ुल्म कब तक चलेगा?
सीरिया, तेरा परचम कब तक जलेगा?

मुझे सेल्फी/फेसबुक में रहने दो,
मसरूफियत का बहाना बनाने दो,
अपनी खुदगर्ज़ी में रमने दो,
मुझे बस ऑंखें मीचे रहने दो
 

रविवार, मार्च 20

कुछ सवाल

सीरिया, इराक हो या फिलिस्तीन का मामला, या फिर कश्मीर का मसला हो, सालों से लोग बस तड़प रहें हैं. छोटे-छोटे बच्चे ज़ुल्म और जंग में बड़े हो रहे हैं। कैसा बचपना और कैसा भविष्य? कुछ बच्चे अब जवान हो गए हैं. क्या सोचते होंगे यह दुनिया के बारे में? अब तो यह जानते होंगे के इन्हें अपने अधिकार नहीं मिले, यह जानते होंगे के जहाँ बाक़ी बच्चे अमन और शांति के बीच स्कूल जाते हैं, बागों में खेलते हैं, दलेरी से किसी से भी मिलते हैं वहां ये और इनके परिवार के लोग रोज़-रोज़ मर मर के जीते हैं. इनमें  से कितनो ने अपने बाबा को क़त्ल होते देखा होगा, कितनो ने माँ की आबरू को उजड़ते देखा होगा. इनमें से कितने दुखी होते होंगे, या कौन-कौन गुस्से से भर जाते होंगे? इन देशों की सरकारें इन बच्चों और जवानों के लिए क्या कर रही हैं?

और औरतों  की तो क्या बात की जाए...! इनके दुखों की तो कोई गिनती ही नहीं है। कभी घर से बेघर, कभी पति के होते पति से दूर या फिर विधवा का जीवन, बच्चों और बुज़र्गों का पालन-पोषण, कभी मानसिक शोषण, कभी बलात्कार,  कभी भुकमरी और कभी एक ही औरत को ये सब बर्दाश्त करना पड़ता है। न जाने किस-किस तरह के बलिदान करने पड़ते हैं। अक्सर यह सब ख़ामोशी से सहना पड़ता है क्यूंकी ज़बान खोलने की सज़ा अलग से मिलती है। सच तो यह की एक औरत की ज़िन्दगी कहीं भी क्यों न हो, आसान नहीं होती मगर हिंसक संघर्ष में औरतें तो जैसे इस दुनिया में नरक भोगती हैं। 

जब कभी भी इन जगहों के बारे में पड़ती या सुनती हूँ, दिल सवालों से भर आता है।  मगर सिर्फ सवालों से किसका पेट भरता है? काश हम इन लोगों की लिए कुछ कर पायें! पर हमें नारों और बातों में मज़ा आता है, बैठे-बैठे ऊँगली उठाने में मज़ा आता है... अगर हमारी सोच किसी नहीं मिलती तो उन्हें ज़लील करने में मज़ा आता है... कुछ करने लिए साथ चलना पड़ेगा, एक दुसरे को सुनना पड़ेगा, एक दूसरे का साथ देना पड़ेगा... खाकी निक्करधारी का भी आदर करना पड़ेगा और सफ़ेद टोपी वाले की भी इज़्ज़त करनी पड़ेगी... शोषित औरत में माँ ढूंढ़नी होगी और पराये बच्चे में में अपनापन पाना होगा... उफ़... बड़ा मुश्किल है ये सब। किसके पास वक़्त इस सब के लिए? अजी छोड़ें ये सब, फिर ढूंढे कोई मुद्दा एक दुसरे की बेइज़्ज़ती करने का, ऊँगली उठाने का... ये लोग हर रोज़ मर रहें तो मरा करें...! 

यह कुछ सवाल उससे हैं जो ऊपर से सब देखता है, कहीं दुआ सुनता है मगर कहीं मजबूर सा नज़र आता है.... 


क्यों यह मसला सुलझता नहीं है?
क्या कोई तरीका नहीं है?
क्या तेरा दिल पिघलता नहीं है?
http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=48341#.Vu8qLMcaxng

पिघलता है तो क्यूँ कुछ बदलता नहीं है?
या फिर कोई तेरी सुनता नहीं है?
बन्दुक छोड़, इनका हाथ दुआ में क्यों उठता नहीं है?
http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=48341#.Vu8qLMcaxng

क्यों इनका सर शर्म से झुकता नहीं है?
अब शायद हर कोई तुझसे डरता नहीं है.
तू खुद ही कुछ क्यूँ करता नहीं है?
क्यों लोगों को हमदर्दी से भरता नहीं है?
क्यों बातचीत से मसला सुलझता नहीं है? 
क्यों अमन से नाता इनका जुड़ता नहीं है?
http://www.cbc.ca/radio/thecurrent/the-current-for-june-18-2015-1.3118206/lifeline-syria-aims-to-bring-1-000-refugees-to-toronto-1.3118254


इन बागों में क्यों गुल-ए-उम्मीद खिलता नहीं है?
क्यों बचपन को खिलने मौका मिलता नहीं है?
http://worldnewsnetwork.co.in/the-pain-of-dardpora-kashmiri-half-widows-living-in-a-state-of-limbo/
क्यों मांओं का आँचल खिलखिलाता नहीं है?
मानवाधिकारों  की जैसे कोई मान्यता ही नहीं है!
प्यार काफ़ी है, कोई क्यों समझता नहीं है?

मंगलवार, फ़रवरी 16

ठहरो ज़रा

मेरी दिल्ली फिर जल रही है,
यहाँ दूर बैठे मेरा दिल बैठा जा रहा है
यह भारत माँ का लाडला,
माँ की बर्बादी क्यों गा रहा है?
वो न्याय के लिए लड़ने वाला,
न्याय को ही क्यों हरा रहा है?
दुनिया की ख़बर सुनाने वाला आज,
पिट कर खुद ख़बरों में आ रहा है?
ये पोलिस वाला चुप क्यों है,
जनता को नहीं,
तो यह किसे बचा रहा है?
और इस सब तमाशे के बीच,
वहां सीमा पर जवान अपनी जान गँवा रहा है!
रुक जाओ टटोलो खुद को, शायद
तुम्हारे अंदर एक इंसान मरा जा रहा है....
ठहरो ज़रा, थम के सोचो तो,
ऐसे में भारत का भविष्य कहाँ जा रहा है?
समझदार हो, अमन से करो जतन ,
देखो, आने वाला कल तुम्हे बुला रहा है।

शुक्रवार, जनवरी 8

जाने दो


क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो,
क्यों किस्मत से लड़ते हो?
जाने दो...

फिर हिंदुस्तान को तरसोगे ,
फिर यादों के जंगल में भटकोगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

क्यों वक़्त अपना ज़ाया करते हो,
क्यों वही पुरानी ख़्वाहिश करते हो
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

बारिश में फिर अपनी मट्टी की खुशबू ढूँढोगे,
बूँदों की आड़ में खुद भी धीरे-धीरे बरसोगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

फिर खलेगा गैर-ज़बान में बतियाना,
जज़्बातों का अंग्रेजी से आँख चुराना,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

फिर माँ की रसोई बुलाएगी,
फिर पिज़्ज़ा की शकल रुलाएगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

हथेली में भाई की उँगलियाँ याद आएँगी,
खाली-पीली फिर आँखें भर आएँगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

वो दिल्ली जो बस्ती है यादों में, अब नहीं है,
वो जादू, वो दौर, वो लम्हें, अब नहीं हैं,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

हाँ, यादों की धूल आज भी सड़कों पे पड़ी होगी,
हर मोड़ पे माज़ी की कोई तस्वीर जड़ी होगी,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

इंडिया गेट, नई दिल्ली फोटो क्रेडिट- अंजना दयाल दे प्रेविट 

फिर दिल्ली की सड़कों को ललचाओगे,
यहाँ तक के सफर को फिर पछताओगे,
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

बचपन ने जिसे रंगा था, वो तितली अब कहाँ मिलेगी?
भीगी थी जिसमे जवानी, वो बदली अब कहाँ मिलेगी?
जाने दो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?

इस दर्द  को यूँ ही ख़ामोश लहू में बहने दो,
याद-ए-सरज़मीं  को यूँ ही चुपचाप सिसकने दो.
जाने दो,
क्यों अपनी ही हस्ती से लड़ते हो,
क्यों दिल के चक्कर में पड़ते हो?
जाने दो....

शुक्रवार, जनवरी 1

मेरी दुआ


2016 आप सभी के लिए मंगलमय हो और ईश्वर से मेरी यही प्राथना है हम सबको अपनी उपस्थिति से भर दे।  आप जो भी हैं, जैसे भी हैं, किसी भी धर्म के मानने वाले हैं, वो आपको बहुत प्रेम करता है। पूरे विश्वास के साथ उस की ऒर देखें, वो आपको अपनी शान्ति से भर देगा। खुश रहें और खुश रखें! :-) :-)

तुझे सोचूं, तुझे देखूं,
तुझे ढूढूं, तुझे पाऊँ।

तू मंज़िल हो हर क़दम की
हर मुकाम पे तुझे पाऊँ।

होंगे और भी खूबसूरत मज़मून,
मैं बस तुझे गुनगुनाऊँ।

तेरी रहमत हो जाए तो,
मैं भी तेरे काम आऊँ।

अमन की कोशिशों में,
मैं भी हिस्सा बन पाऊँ।  

फोटो: गूगल 

लाया है जिसके लिए मुझे यहाँ,
उस मकसद को पूरा कर जाऊँ।

कुछ और नहीं, बस ईमान माँगू तुझसे,
तेरा ही चेहरा ताकूँ जब-जब घबराऊँ।

मुश्किल में हूँ या मज़े में,
मैं हर बात में शुक्र मनाऊँ।  

ज़िन्दगी का कोई सफर हो,
तेरे पीछे-पीछे चली आऊँ।

कोई भी, कहीं भी मिले,
हर चेहरे में तुझे पाऊँ। 

बस तुझे सोचूं, बस तुझे देखूं,
बस तुझे ढूढूं, बस तुझे पाऊँ।